गोरखपुर। भारत में नारी शक्ति का स्थान सदैव अग्रणी और सम्मानित रहा है। प्रतिवर्ष 8 मार्च को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस केवल एक औपचारिक तिथि नहीं है, बल्कि यह महिलाओं के संघर्ष, संकल्प, उपलब्धियों और उनके योगदान को सम्मान देने का अवसर है। यह दिन समाज को यह स्मरण कराता है कि महिला सशक्तिकरण केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक सशक्त और विकसित राष्ट्र के निर्माण की अनिवार्य शर्त है।
भारतीय संस्कृति, परंपरा और वैचारिक विरासत में नारी के सम्मान का विशेष महत्व रहा है। हमारे धर्मग्रंथों और सामाजिक परंपराओं में नारी को सृजन, करुणा, धैर्य और शक्ति का प्रतीक माना गया है। आज यह हमारे लिए गौरव का विषय है कि विश्व समुदाय भी महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता और महत्व को स्वीकार कर रहा है।
यदि समाज में मर्यादा, समानता और नारी सम्मान की भावना होगी तो अनेक सामाजिक समस्याएँ स्वतः समाप्त हो जाएँगी। महिलाओं को शिक्षा, अवसर और संसाधन प्रदान किए जाने पर वे समाज और राष्ट्र को कई गुना अधिक लौटाने की क्षमता रखती हैं। भारत की जीवन शैली में महिलाओं की भूमिका परिवार से लेकर समाज और राष्ट्र निर्माण तक अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सशक्तिकरण में भी महिलाओं का योगदान उल्लेखनीय है। खेती, पशुपालन, कुटीर उद्योग और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं ने आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाए हैं। समय के साथ शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, प्रशासन, राजनीति और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में भी महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए “विकास के साथ विरासत” के सूत्र को आगे बढ़ाया है। उनके नेतृत्व में महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी सशक्तिकरण के लिए अनेक योजनाएँ संचालित की जा रही हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना, महिला स्व-रोजगार योजनाएँ तथा सुकन्या समृद्धि योजना जैसी पहलें महिलाओं के जीवन स्तर को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
फिर भी समाज में कई बार महिलाओं के जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय परिवार, समाज या परंपराओं के दबाव में तय कर दिए जाते हैं। प्रकृति ने महिलाओं को संवेदनशीलता, धैर्य और सृजन की अद्भुत क्षमता दी है, लेकिन कई बार सामाजिक सोच और परंपरागत धारणाओं के कारण उनकी स्वतंत्रता सीमित कर दी जाती है। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे अपने सपनों, इच्छाओं और भावनाओं को परिवार या समाज की सोच के अनुसार ढाल लें।
समाज को यह समझना होगा कि महिलाओं को भी अपने जीवन, शिक्षा, करियर और जीवनशैली से जुड़े फैसले लेने की उतनी ही स्वतंत्रता और सम्मान मिलना चाहिए जितना पुरुषों को मिलता है। जब समाज महिलाओं पर लगी अनावश्यक पाबंदियों को समाप्त कर उनकी प्रतिभा और व्यक्तित्व को विकसित होने का अवसर देगा, तभी एक संतुलित, न्यायपूर्ण और प्रगतिशील समाज का निर्माण संभव होगा।
महिलाएँ केवल परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे समाज और राष्ट्र के विकास की मजबूत आधारशिला हैं। उन्हें बराबरी का सम्मान, अवसर और निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। वह सोच, जिसमें महिलाओं को केवल पर्दे में रहने या मातृत्व की भूमिका तक सीमित समझा जाता है, उसे बदलना होगा।
वास्तव में व्यक्ति, परिवार और समाज के निर्माण के केंद्र में नारी ही है। इसीलिए विकसित भारत के निर्माण में महिला स्वावलंबन और सम्मान को विशेष महत्व दिया गया है। यदि नारी मानसिक, बौद्धिक और आर्थिक रूप से सशक्त, आत्मनिर्भर और समृद्ध होगी तो निश्चित रूप से परिवार, समाज, प्रदेश और राष्ट्र भी सशक्त बनेगा।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस हमें यह अवसर देता है कि हम केवल औपचारिक शुभकामनाएँ देने तक सीमित न रहें, बल्कि महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा, शिक्षा और आत्मनिर्भरता को सुनिश्चित करने का वास्तविक संकल्प लें। जब यह संकल्प व्यवहार और नीतियों में दिखाई देगा, तभी अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की सार्थकता सिद्ध होगी।
आइए, इस अवसर पर हम सभी यह संकल्प लें कि नारी शक्ति को सम्मान, अवसर और समान अधिकार देकर एक समृद्ध, विकसित और संवेदनशील भारत के निर्माण में सक्रिय योगदान देंगे।

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