शिवाकांत अवस्थी
पत्रकारिता को समाज का चौथा स्तंभ कहा जाता है। यह केवल सूचना देने का माध्यम नहीं, बल्कि जनमत निर्माण, सत्ता पर निगरानी और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का एक महत्वपूर्ण दायित्व भी निभाती है। ऐसे में पत्रकार का नाम अपने आप में एक विश्वसनीय पहचान और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है। लंबे समय तक यह धारणा रही है कि, एक सच्चे पत्रकार को अपनी पहचान स्थापित करने के लिए किसी प्रकार के व्यक्तिगत प्रचार की आवश्यकता नहीं पड़ती; उसका कार्य, उसकी निष्पक्षता और उसकी लेखनी ही उसके नाम को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए पर्याप्त होती है।
आपको बता दें कि, पारंपरिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो पत्रकार की भूमिका एक सजग पर्यवेक्षक और तथ्य प्रस्तुत करने वाले माध्यम की होती है। वह स्वयं को केंद्र में न रखकर समाज, घटनाओं और जनहित के मुद्दों को केंद्र में रखता है। इसी कारण कई विद्वान यह मानते हैं कि, यदि पत्रकार को स्वयं को सोशल मीडिया या अन्य मंचों पर प्रचारित करना पड़े, तो यह पत्रकारिता की मूल भावना के विपरीत प्रतीत होता है। उनके अनुसार पत्रकार स्वयं एक सार्वजनिक पहचान होता है—एक ऐसा नाम जिस पर पाठक या दर्शक भरोसा करते हैं। इसलिए उसकी प्रतिष्ठा उसके कार्य से निर्मित होती है, न कि आत्म-प्रचार से।
हालाँकि, वर्तमान समय में संचार के साधनों में आए व्यापक परिवर्तन ने इस बहस को नया आयाम दिया है। डिजिटल युग में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सूचना के प्रसार का एक प्रमुख माध्यम बन चुके हैं। अनेक पत्रकार इन मंचों का उपयोग केवल आत्म-प्रचार के लिए नहीं, बल्कि समाचारों के त्वरित प्रसार, पाठकों से संवाद स्थापित करने और घटनाओं की प्रत्यक्ष जानकारी साझा करने के लिए भी करते हैं। ऐसे में सोशल मीडिया को पूरी तरह निंदनीय मान लेना भी एकांगी दृष्टिकोण हो सकता है।
वास्तव में मूल प्रश्न यह नहीं है कि, पत्रकार सोशल मीडिया का उपयोग करता है या नहीं, बल्कि यह है कि, वह उसका उपयोग किस उद्देश्य से करता है। यदि यह मंच व्यक्तिगत लोकप्रियता, पक्षपातपूर्ण विचारों के प्रचार या अनावश्यक आत्म-प्रदर्शन का माध्यम बन जाए, तो निश्चित रूप से यह पत्रकारिता की गरिमा को कम कर सकता है। किंतु यदि इसका उपयोग जनहित की सूचनाओं को शीघ्र और व्यापक रूप से पहुँचाने के लिए किया जाए, तो यह पत्रकारिता की शक्ति को और अधिक प्रभावी बना सकता है।
अंततः पत्रकारिता की वास्तविक प्रतिष्ठा उसके नैतिक मूल्यों, सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता में निहित होती है। एक पत्रकार का नाम तभी स्थायी सम्मान प्राप्त करता है जब उसकी लेखनी तथ्यपरक, संतुलित और जनहित के प्रति समर्पित हो। तकनीक और माध्यम समय के साथ बदल सकते हैं, किंतु पत्रकारिता की मूल आत्मा—सत्य की खोज और समाज के प्रति उत्तरदायित्व—सदैव अपरिवर्तित रहनी चाहिए।

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